Saturday, January 23, 2010

हाँ वो सपूत वीर सुभाषचंद्र बोस ही था,

गड़..ड़..ड़..ड़...ड़..ड़..ड़.. गर्जना घनघोर थी|

तड़..ड़..ड़..ड़..ड़..ड़..ड़.. ताड़ना चहुँ और थी||

आर पार तार तार शर्मसार चुनड़ी की कौर थी |

तानाशाही, क्रूरपन, मलेछों की सिरमोर थी||


भारत माँ के आँचल में जब अनगिनत छेद थे |

अंग्रेजों के प्रगाढ़ किल्ले जब पूरी तरह अभेद थे ||

रामायण के राम खोये थे , गीता और पुराण सोये थे |

बेबस सारे ग्रन्थ और कुरआन,सोये सारे वेद थे ||


दन..न..न..न..न..न..न.. दनदनाते आया था |

हड़..ड़..ड़..ड़..ड़..ड़..ड़..भूचालों को लाया था ||

हाँ वो सपूत वीर सुभाषचंद्र बोस ही था,

अंग्रेजों के दांतों को जिसने लोहे का चना चबवाया था !

Saturday, January 16, 2010

क्या फ़ालतू की बात करते हो!!!

(बुरे खयालात और अच्छे ख्यालात में जंग होने लगी तो कुछ टूटता फूटा लिख डाला)

फुरसत नहीं मोहब्बत करने से |
आप नफरत करने की बात करते हो||
पाक ख़यालों की सोहबत से फुर्सत नहीं|
द्वेष को आप आत्मसात करते हो||

तोड़ने की कोशिश में हूँ मजहबी दायरे |
आप दरो दीवार की बात करते हो||
मशगुल हूँ मैं दिलों के जख्म सीने में|
आप चाके दिल करने बात करते हो ||

मैं चैनो अमन का पुजारी हूँ|
आप हुडदंग करने की बात करते हो||
मैं मेल मिलाप की बात करता हूँ|
आप हमेशां अलगाववाद करते हो||

आप हमेशां खुनी खंजर लिए फिरते हो|
इंसानियत पर आघात करते हो||
तुम किसी मजहब के नहीं फिर भी,
ना जाने कौन से मजहब की बात करते हो||

Wednesday, January 13, 2010

"टिप्पणियों के अभाव में" !!

मिलकर रहो क्या रखा है अलगाव में!!
दिल की सुनो मत बहको किसी के दबाव में!!
क्या हिन्दू, क्या मुस्लिम, सिक्ख ,इसाई क्या !!
इंसानियत का नाता हो आत्मा के लगाव में!!

प्रेम सोहार्द मिलते नहीं बाजार के भाव में !
भावनाओं को मत मारो खुदगर्जी के चाव में !!
जात पात घृणा नफरत तपते हुए सेहरा हैं !
सीतल प्रेम की छैंयाँ बैठो क्या रखा है ताव में!!


कहाँ किसी का भला हुआ आज तक टकराव में !
मनके मणके पिरो माला बनो क्या रखा बिखराव में !!
हर गहरा जख्म भर जाता है बोली का जख्म नहीं भरता !
मीठे बोल से सहद घोलो, दर्द बहुत है बोलों के घाव में !!

दम तोड़ देती हैं कलियाँ लापरवाही के रखरखाव में!
दया प्रेम ममता करुणा शामिल करलो स्वभाव में !!
यहाँ हर एक तुर्रम खान है यहाँ अपनी बिसात क्या!!
दम तोड़ देता है ब्लोगर धीरे धीरे "टिप्पणियों के अभाव में" !!










Saturday, January 9, 2010

इंसानी प्रेम में स्वार्थ है !!

प्रेम शब्द का इंसानों के लिए अलग अलग मतलब है| हर प्रेम में स्वार्थ है !
माँ बाप अपने बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करते हैं ये लालसा रहती है की बड़ा होकर सहारा बनेगा|
बुढापे में सेवा करेगा! एक लड़की से लड़का या लड़के से लड़की इसलिए प्रेम करती है की बदले में वो भी उसे प्रेम करे |
मगर एक चिड़िया अपने अण्डों को हिफाजत करके उसमे से निकलने वाले चुज्जों को दाना चुगाकर बड़ा करती है | चुज्जे बड़े होकर उड़ जाते है| चिड़िया को किसी प्रतिफल की इच्छा नहीं !
गाय अपने बछड़े की देख रेख करती है उसे प्रेम करती है बड़ा हो कर बछडा क्या उसकी सेवा करता है?
ये है निस्वार्थ प्रेम ! ऐसा प्रेम ही पुजारी से पूज्य बनाता है | आत्मा से महात्मा बनाता है !!

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