एक खुले सांड की तरह कल्पना लोक के उन्मुक्त गगन में अपने विचारों को खुला छोड़ दो, उड़ने दो जहां उड़ना चाहते हैं !
क्यों पाबंदिया? क्यों पहरे? किसी भी धर्म, किसी भी समाज, किसी भी संस्था के बारे में पढो समझो और सोचो !! दायरे क्यों धर्म के ? पाबंदियां क्यों मजहब की? क्यों जरुरत है मेरी पहचान की क्या ये काफी नहीं की मैं एक इन्सान हूँ ! न मुस्लिम, न हिन्दू, न सिख, न इसाई,| सब धर्म मेरे हैं सब मजहब को मैं पूजता हूँ|