
एक बार ऐसा हुआ था गुजरात में |
दो सांड निकले थे एक बार रात में |
ख़ामोशी जहां पसरी हुई पड़ी थी |
क़त्ल की रात मुह बाए खड़ी थी||
दोनों एक दुसरे से थे भयभीत |
कौमी एकता की टूट चुकी थी प्रीत| |
भयभीत दोनों, चल तो रहे थे एक साथ |
पर चाहते हुए भी ना कर पा रहे थे बात ||
दोनों अपनी अपनी छुपा रहे थे पहचान |
पता ही नहीं चला की वो हिन्दू थे या मुसलमान||
आखिर चलते चलते दोनों की मंजिल आई |
अपने घर में घुसने से पहले दोनों ने नजरें मिलाई||
दोनों की चाल डगमगाई हुई थी |
दोनों की आँखें डबडबाई हुई थी ||
हिन्दू मुस्लिमों ने दंगा क्या किया |
इंसानियत को इन्होने नंगा किया ||
बेहतरीन रचना। बधाई।
ReplyDeleteखुला सांड करारी चोट है भाई ऐसे ही लिखते रहिए। बधाई
ReplyDeleteहिन्दू मुस्लिमों ने दंगा क्या किया |
ReplyDeleteइंसानियत को इन्होने नंगा किया ||
वाह क्या बात है, आप ने अपनी कविता मै बहुत गहरी बात कही.
धन्यवाद
khuda aapke saaaandpan ko mahfooz rakhe. Shubh kamnayen...
ReplyDeleteबहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने ! हर एक पंक्तियाँ सच्चाई बयान करती है! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!
ReplyDeleteगुजरात में ही नहीं हर कहीं
ReplyDeleteजो भी इंसानियत को नंगा करेगा
उनकी चाल डगमगाएगी
आँखें डबडबाएगी।
hindu muskim ne kya kiya, insaniyat ko nanga kiya.........bahut khoob.
ReplyDeletebemisal.........................
ReplyDeletechhupa rahe the apni pahchan .........???
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